
शादी हो चुकी थी और सारे मेहमान अब खाना खाकर जा चुके थे। शादी की सारी विधि पूरी होते होते रात के एक बज गये थे। और इस वक्त सारे बड़े बूढ़े हवेली के पीछे ड्रिंक कर रहे थे। तो हवेली के outhouse को अच्छे से सजाया गया था। क्योंकि कृतिका आज रात यही रहने वाली थी। पंडित जी ने घर प्रवेश के लिए सुबह आठ बजे का टाइम बताया था। इस वक्त कृतिका एक रूम में बैठी थी। वो आईने में अपने आप को देख रही थी।
और उसके बगल में एक लड़की जिसने सफेद साड़ी पहनी हुई थी। और किसी साध्वी की तरह लग रही थी। वो कृतिका के गहनों को उतार रही थी। वो कृतिका को ऐसे अपने ख्यालों में खोया देख कर बोली,"क्या हुआ कृति? तुम इतनी परेशान क्यों हो? आज तुम्हारी शादी हुई हैं तुम्हें एक नई ज़िदगी मिलेगी। तुम्हे अब एक नया परिवार मिलेगा जो तुम्हें बहुत प्यार देगा। तुम अब उस घर से निकल चुकी हो। जहां किसी ने तुमसे प्यार नहीं किया।"


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